सर्किल रेट (सरकारी न्यूनतम मूल्य) और बाजार भाव (असली कीमत) में क्या फर्क है, स्टाम्प ड्यूटी किस पर लगती है, और सर्किल रेट से कम पर सौदा दिखाने पर टैक्स का क्या असर होता है — पूरी जानकारी।

जमीन खरीदते समय दो कीमतें सामने आती हैं — सर्किल रेट और बाजार भाव। बहुत से लोग इन्हें एक समझ लेते हैं, जबकि दोनों अलग हैं और खर्च व टैक्स पर सीधा असर डालते हैं।

सर्किल रेट क्या है?

सर्किल रेट वह न्यूनतम सरकारी मूल्य है जो जिला प्रशासन (DM/कलेक्टर) हर क्षेत्र के लिए तय करता है। इससे कम कीमत पर किसी संपत्ति की रजिस्ट्री नहीं हो सकती। इसे गाइडलाइन रेट, सरकारी रेट या DM रेट भी कहते हैं।

बाजार भाव (Market Value) क्या है?

बाजार भाव वह असली कीमत है जिस पर खरीदार और विक्रेता के बीच सौदा तय होता है। यह मांग-आपूर्ति पर निर्भर करता है और अक्सर सर्किल रेट से ज्यादा होता है।

मुख्य अंतर एक नजर में

  • तय कौन करता है: सर्किल रेट — सरकार; बाजार भाव — खरीदार/विक्रेता।
  • मतलब: सर्किल रेट — न्यूनतम सरकारी मूल्य; बाजार भाव — असली सौदा कीमत।
  • आमतौर पर: सर्किल रेट कम या बराबर; बाजार भाव ज्यादा।
  • उपयोग: सर्किल रेट — रजिस्ट्री/स्टाम्प ड्यूटी की न्यूनतम सीमा; बाजार भाव — वास्तविक लेन-देन।

स्टाम्प ड्यूटी किस पर लगती है?

स्टाम्प ड्यूटी हमेशा सर्किल रेट और बाजार भाव में से जो अधिक हो, उस पर लगती है। यानी अगर बाजार भाव सर्किल रेट से ज्यादा है, तो ड्यूटी बाजार भाव पर लगेगी; और अगर सर्किल रेट ज्यादा है, तो सर्किल रेट पर।

सर्किल रेट से कम पर सौदा दिखाना जोखिम भरा है — आयकर विभाग अंतर को "आय" मानकर खरीदार और विक्रेता दोनों पर टैक्स लगा सकता है (आयकर अधिनियम की धारा 43CA/50C/56)।

उदाहरण से समझें

मान लीजिए किसी प्लॉट का सर्किल रेट ₹40 लाख है, पर आप उसे ₹50 लाख में खरीद रहे हैं। स्टाम्प ड्यूटी ₹50 लाख (अधिक मूल्य) पर लगेगी। वहीं अगर बाजार भाव ₹35 लाख होता (सर्किल रेट से कम), तो ड्यूटी ₹40 लाख पर लगती।

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